शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

विधा -गीत ( मंदिर मस्जिद गुरु-द्वारे )

विधा -गीत ( मंदिर मस्जिद गुरु-द्वारे )
मात्राभार प्रति पंक्ति =16 +16


मंदिर मस्जिद गुरु-द्वारे की,
अन्तर-व्यथा को  कहूँ  कैसे ?
नीर  भरे  उनके   नैनों   की ,
पीड़ा  को  बयाँ  करूँ  कैसे ?


मंदिर ने मस्जिद से  पूछा ,
री ! हाल बता क्या है तेरा ?
मस्जिद बोली आतँक गहरा,
निर्दोषी  रक्त  सहूँ  कैसे ?

मस्जिद भी पूछे मंदिर से,
तू भी तो हाल बता अपना ;
मंदिर बोला  लड़ते  सारे ,
मैं  चिन्ताहीन रहूँ  कैसे ?

गुरु-द्वारे ने  मौका  देखा ,
चर्च से पूछा  उसका हाल ;
भीषण  बम्ब बनाते  सारे,
दुखी मन, विनाश वरूँ कैसे ?

चर्च का प्रश्न गुरु-द्वारे से ,
अब कैसे कटते दिन तेरे  ?
उत्तर आया ईर्ष्या में सब ,
आँसू  अपने  रोकूँ   कैसे ?

आँखें  उनकी  भरी-भरी थी ,
था दिल भी उनका भरा-भरा ;
सपना ही था  पर अच्छा था ,
उसको  मैं  अब  भूलूँ  कैसे ?

हृदयहीन तो चिन्तित देखे,
पर हृदयवान हैं  सब  जीरो ;
मानव मानवता छोड़ चला ,
उसको मानव कह दूँ   कैसे ?

*****सुरेशपाल वर्मा जसाला (दिल्ली)




2 टिप्‍पणियां:

  1. थी आँखें उनकी भरी-भरी,
    था दिल भी उनका भरा-भरा ;
    सपना ही था पर अच्छा था ,
    उसको मैं अब भूलूँ कैसे ?

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