बुधवार, 12 अगस्त 2015
बुधवार, 29 जुलाई 2015
मुक्तक (muktak)
******मुक्तक ******
( हर आतंकी को फांसी दो ,,फांसी का विरोध करे जो,,उसको भी फांसी दो )
आतंकी की फांसी पर भी ,राजनीति गरमाती है ;
हमदर्दी रखने वालों को ,शरम क्यों नहीं आती है ;
भारत माँ पर कट्टर दुश्मन ,करते हैं आघात सदा ;
चुन-चुन मारो गद्दारों को,फांसी राह दिखाती है।
*****सुरेशपाल वर्मा जसाला [दिल्ली]
( हर आतंकी को फांसी दो ,,फांसी का विरोध करे जो,,उसको भी फांसी दो )
आतंकी की फांसी पर भी ,राजनीति गरमाती है ;
हमदर्दी रखने वालों को ,शरम क्यों नहीं आती है ;
भारत माँ पर कट्टर दुश्मन ,करते हैं आघात सदा ;
चुन-चुन मारो गद्दारों को,फांसी राह दिखाती है।
*****सुरेशपाल वर्मा जसाला [दिल्ली]
रविवार, 26 जुलाई 2015
गुरुवार, 23 जुलाई 2015
बुधवार, 22 जुलाई 2015
वर्ण पिरामिड / varn piramid (जसाला पिरामिड / jasala piramid )
((((((****यह मेरी नवविधा है - ''वर्ण पिरामिड''****)))))
****************************** **************
[इसमे प्रथम पंक्ति में -एक ; द्वितीय में -दो ; तृतीया में- तीन ; चतुर्थ में -चार; पंचम में -पांच; षष्ठम में- छः; और सप्तम में -सात वर्ण है,,, इसमें केवल पूर्ण वर्ण गिने जाते हैं ,,,,मात्राएँ या अर्द्ध -वर्ण नहीं गिने जाते ,,,यह केवल सात पंक्तियों की ही रचना है इसीलिए सूक्ष्म में अधिकतम कहना होता है ,,किन्ही दो पंक्तियों में तुकांत मिल जाये तो रचना में सौंदर्य आ जाता है ] जैसे-
ये
वर्षा
कनक-
झरें बूंदें,
उड़े विहग ,
तरुवर सूने ,
आनंद कंद फूले । [१]
थे
वट
पीपल ,
आम,नीम,
कुँए के पास ,
झूलों की मस्ती में -
खिले मन उदास। [२]
हे
प्रभु
शंकर !
बेल-पत्र -
करूँ अर्पण ,
हो व्याधि निदान ,
कष्टों का समाधान । [३]
तू
मेरा,
में तेरा,
जीव-जीव
कण -कण का
तू ही आधार है ,
प्रभु निर्विकार है। [४]
********सुरेशपाल वर्मा जसाला [दिल्ली]
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[इसमे प्रथम पंक्ति में -एक ; द्वितीय में -दो ; तृतीया में- तीन ; चतुर्थ में -चार; पंचम में -पांच; षष्ठम में- छः; और सप्तम में -सात वर्ण है,,, इसमें केवल पूर्ण वर्ण गिने जाते हैं ,,,,मात्राएँ या अर्द्ध -वर्ण नहीं गिने जाते ,,,यह केवल सात पंक्तियों की ही रचना है इसीलिए सूक्ष्म में अधिकतम कहना होता है ,,किन्ही दो पंक्तियों में तुकांत मिल जाये तो रचना में सौंदर्य आ जाता है ] जैसे-
ये
वर्षा
कनक-
झरें बूंदें,
उड़े विहग ,
तरुवर सूने ,
आनंद कंद फूले । [१]
थे
वट
पीपल ,
आम,नीम,
कुँए के पास ,
झूलों की मस्ती में -
खिले मन उदास। [२]
हे
प्रभु
शंकर !
बेल-पत्र -
करूँ अर्पण ,
हो व्याधि निदान ,
कष्टों का समाधान । [३]
तू
मेरा,
में तेरा,
जीव-जीव
कण -कण का
तू ही आधार है ,
प्रभु निर्विकार है। [४]
********सुरेशपाल वर्मा जसाला [दिल्ली]
गीतिका : (तोता बैठा है मंदिर पर)
विधा-गीतिका
मात्राभार -16 +16 प्रति पंक्ति ,,,मापनी मुक्त
केवल पदांत =ऐना
तोता बैठा है मंदिर पर ,,,,,,,,,,,,,,,मस्जिद पर बैठी है मैना ,
नाचे मोर चर्च के ऊपर ,,,,,,,,,,,कोकिल कूके गुरु-द्वारे पर ,
जब तक आँखे चार न कर लें ,कभी न मिलती उनको चैना ।
मंदिर तोता उड़ मस्जिद पे ,,,,,,मस्जिद की मैना मंदिर पे ,
उड़ते दोनों सँग -सँग देखो ,,,,,,,,,,,,भेदभाव कोई मन है ना ।
कभी मोर गुरु-द्वारे जाता,,,,,,,,,अरु कोयल जाती चर्चों पर ,
कूक -कूक मस्ती में गावें ,,,,,,,,,,मोहक उनके मिसरी बैना ।
भेदभाव क्यूँ हमने धारा ,,,,,,क्यूँ नफ़रत पाली मन-मन में ,
धो डालें आओ दाग सभी ,,,,,,,,,,ये रगड़ प्रीत-साबुन फैना ।
कहे जसाला स्वयं को बदले ,,,,बदल जायेगी सारी दुनिया ,
स्वार्थ की जंजीरें तोड़ें ,,,,,,,,,,,,,,,,,,चमक उठेंगे सबके नैना ।
*****सुरेशपाल वर्मा जसाला (दिल्ली)
शुक्रवार, 17 जुलाई 2015
विधा -गीत ( मंदिर मस्जिद गुरु-द्वारे )
विधा -गीत ( मंदिर मस्जिद गुरु-द्वारे )
मात्राभार प्रति पंक्ति =16 +16

मंदिर मस्जिद गुरु-द्वारे की,
अन्तर-व्यथा को कहूँ कैसे ?
नीर भरे उनके नैनों की ,
पीड़ा को बयाँ करूँ कैसे ?

मंदिर ने मस्जिद से पूछा ,
री ! हाल बता क्या है तेरा ?
मस्जिद बोली आतँक गहरा,
निर्दोषी रक्त सहूँ कैसे ?
मस्जिद भी पूछे मंदिर से,
तू भी तो हाल बता अपना ;
मंदिर बोला लड़ते सारे ,
मैं चिन्ताहीन रहूँ कैसे ?
गुरु-द्वारे ने मौका देखा ,
चर्च से पूछा उसका हाल ;
भीषण बम्ब बनाते सारे,
दुखी मन, विनाश वरूँ कैसे ?
चर्च का प्रश्न गुरु-द्वारे से ,
अब कैसे कटते दिन तेरे ?
उत्तर आया ईर्ष्या में सब ,
आँसू अपने रोकूँ कैसे ?
आँखें उनकी भरी-भरी थी ,
था दिल भी उनका भरा-भरा ;
सपना ही था पर अच्छा था ,
उसको मैं अब भूलूँ कैसे ?
हृदयहीन तो चिन्तित देखे,
पर हृदयवान हैं सब जीरो ;
मानव मानवता छोड़ चला ,
उसको मानव कह दूँ कैसे ?
*****सुरेशपाल वर्मा जसाला (दिल्ली)
मात्राभार प्रति पंक्ति =16 +16

मंदिर मस्जिद गुरु-द्वारे की,
अन्तर-व्यथा को कहूँ कैसे ?
नीर भरे उनके नैनों की ,
पीड़ा को बयाँ करूँ कैसे ?

मंदिर ने मस्जिद से पूछा ,
री ! हाल बता क्या है तेरा ?
मस्जिद बोली आतँक गहरा,
निर्दोषी रक्त सहूँ कैसे ?
मस्जिद भी पूछे मंदिर से,
तू भी तो हाल बता अपना ;
मंदिर बोला लड़ते सारे ,
मैं चिन्ताहीन रहूँ कैसे ? गुरु-द्वारे ने मौका देखा ,
चर्च से पूछा उसका हाल ;
भीषण बम्ब बनाते सारे,
दुखी मन, विनाश वरूँ कैसे ?चर्च का प्रश्न गुरु-द्वारे से ,
अब कैसे कटते दिन तेरे ?
उत्तर आया ईर्ष्या में सब ,
आँसू अपने रोकूँ कैसे ?
आँखें उनकी भरी-भरी थी ,
था दिल भी उनका भरा-भरा ;
सपना ही था पर अच्छा था ,
उसको मैं अब भूलूँ कैसे ?
हृदयहीन तो चिन्तित देखे,
पर हृदयवान हैं सब जीरो ;
मानव मानवता छोड़ चला ,
उसको मानव कह दूँ कैसे ?
*****सुरेशपाल वर्मा जसाला (दिल्ली)
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